शेखपुरा कदीम सहित 14 गांवों के प्रधानों को मिला घर बैठे वरदान।

सहारनपुर।कहते है जब किस्मत खराब होती है तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है। और जब किस्मत मेहरबान होती है तो गधा भी पहलवान बन जाता है।




यह दोनो कहावत उन 14 गांवों की जनता और प्रधानों के लिए है जो नगर निगम में लग जाने के कारण कहीं खुशी कहीं गम के बीच जी रहे थे। यूपी की अखिलेश सरकार ने सहारनपुर में अपनी पेंठ मज़बूत करने के लिए 14 मुस्लिम बाहुल्य गांवों को नगर निगम में जोड़ा था लेकिन समय कम होने के चलते या यह कहिये की घरेलू फसादों के कारण अखिलेश सरकार अपने आदेशों को अमलीजामा नही पहना सकी।




लेकिन इन 14 गांवों के प्रधानों की स्थिति देखने लायक थी। हर जगह पैर मार कर हार मान चुके यह प्रधान बेबस कबूतर के माफ़िक निराश होकर बैठ गए थे। और इन गांवों के ग्रामीणों की ख़ुशी का ठिकाना नही था कि गांव वाली ज़िन्दगी से बोर होकर अब यह लोग भी शहरी ज़िन्दगी जी सकेंगे।

लेकिन जब किस्मत में लिखे हो रोड़े तो कहाँ मिलेंगे ब्रेड के पकोड़े सत्ता बदली सरकार बदली और 14 गांवों के प्रधानों ने भाजपा नेताओं की परिक्रमा शुरू की ओर भाजपा को डर दिखाया कि अगर यह मुस्लिम बाहुल्य 14 गांव जनपद सहारनपुर की सीमाओं में इज़ाफ़ा कर देते है तो भाजपा जनपद सहारनपुर से विलुप्त हो जाएगी। भाजपा सांसद और विधायकों के प्रतिनिधि मंडल ने यह सूचना हाई कमान को दी और हाई कमान ने इन 14 गांवों को नगर निगम सहारनपुर से बाहर का रास्ता दिखा दिया।




अब इन 14 गांवों के प्रधान फुले नही समा रहे है। क्योंकि इनके बैंक खाते जो सील कर दिए गए थे उनको खोल दिया गया है। और स्कीम व योजनाओं का पैसा आना शुरू हो जाएगा।

*धरातल पर नही है विकास*
अगर बात करें जनपद सहारनपुर से सटे सबसे बड़े गांव शेखपुरा कदीम की तो गांव के अंदर की स्थिति ऐसी है ना तो सड़कों का विस्तार है और ना ही पानी की निकासी के लिए नालियों की साफ सफाई। यहां तक कि शेखपुरा कदीम में ग्रामीणों के लिए कूड़ा डालने तक कि भी व्यवस्था नही है। जो जमादार पहले कुड्डा उठाने का काम करते थे। जनपद करीब होने के चलते जमादारों ने सरकारी अस्पताल व प्राइवेट अस्पतालों में साफ सफाई का काम करना शुरू कर दिया है। जिससे अब ग्रामीणों को अपने निजी जमादार भी नही मिल पा रहे है।




जिससे सड़कों पर ग्रामीण कूड़े को डालने का काम करते है। ग्राम प्रधान ,नगर पंचायत या ग्राम समाज द्वारा आजतक भी कूड़े दान नही बनवाया गया। दूसरा चिक्तिसा औऱ शिक्षा के नाम पर शेखपुरा कदीम में भवन तो बनवाए गए है यदि किसी अधिकारी को फुरसत मिले तो जाकर सर्वे किया जाए और कितनी खामियां गांव की चिकित्सा ओर शिक्षा में मिलेंगी खुद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। सरकार द्वारा गांव में एक सामुदायिक केंद्र बनवाया गया था जो एक परिवार को किराए पर दे दिया गया और सामुदायिक केंद्र में गृहस्ती करवाई जा रही है। सरकारी स्कूल की अगर बात करें तो सरकारी स्कूल बाहरी सड़क से 3 फुट की नीचाई पर चल गया है। और बरसात में स्कूल में पढ़ने आने वाले छात्र छात्राएं मेंढक ओर मछली पकड़ने की प्रैक्टिस करने स्कूल में आते है। अब आप अनुमान लगाइये की कैसी शिक्षा और चिकित्सा शेखपुरा कदीम में दी जा रही होगी।




लेकिन नगर निगम में जानें का बिरोध करने वाले प्रधान और उनके समर्थक कब तक सच्चाई को छिपा कर रखेंगे। जग जाहिर तो होगी और जल्द होगी।

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